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बात तब की है जब डेरे का काम चल रहा था

बात तब की है जब डेरे का काम चल रहा था और हजारो सेवादार सेवा मे लगे रहते थे.
उस समय ईंटे बाहर से लाइ जाती थी
रास्ते मे सडक के किनारे एक मोची अपनी दुकान लगाया करता था.
उसे न तो सतंमत का ग्यान था और न ही वह डेरे के बारे मे कुछ जानता था. उसका खान-पान अाचार-विचार सब सतंमत के विपरित थे. एक दिन ईटें ले जाते समय एक ईंट गिर गई.
उसने देखा और न जाने क्या सोच कर उसने वह ईंट उठा कर वापस वाहन पर रख दी.
शायद उसकी सोच यह रही हो कि डेरे की एक ईंट का नुकसान न हो. और वह फिर अपने काम मे लग गया.
कहते हैं कि …….
जब उसका अंत समय आया तो उसे लेने यम के दूत आये और उसे ले जाकर धर्मराज के सामने खडा कर दिया.
उन यमदूतों की आकृति देखकर वह थर-थर कांप रहा था.
धर्मराज ने जब उसका लेखा पढा तो उसके जीवन में एक भी अच्छा कर्म नहीं था. सारा जीवन दुष्कर्मो से भरा पडा था अब वह समझ गया कि मुझे नरकों मे जाने से कोई नही बचा सकता हैं रक्त से भरी आखें बडे-बडे सिंग बदबूदार बदन और बडे-बडे दांत वाले यमदूत जैसे ही उसे पकडने लपके कि उसी समय…. .
वे एक रौबदार आवाज सुन कर रूक गये.
“रुकौ उसे छूना भी मत ये मेरा बंदा है तुम उसे हाथ भी मत लगाना.”
यमदूत उस रौबदार आवाज सुनकर सहम गये और पिछे हट गये.

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वह बंदा भी मालिक के आगे हाथ जोड कर खडा हो गया.
उसे याद नही आ रहा था कि ये मुक्ति-दाता कौन हैं…? तब धर्मराज बडे अदब से उठ कर खडे हो गये और बोले- पर मालिक जी इसके लेखे मे तो एक भी शुभ कर्म नहीं हैं. फिर ये नरको मे जाने से कैसे बच सकता हैं?
मालिक जी ने कहा- ध्यान से इसका हिसाब देखो बहुत पहले इसने मेरे डेरे की एक सेवा की थी.
धर्मराज- हां मगर वो तो एक छोटी सी सेवा थी और वह भी अनजाने मे की थी.
क्या इतनी सी सेवा से किसी को आपकी शरण मिल सकती हैं.?
मालिक जी- देखो धर्मराज जी मेरे पास आने को एक ही सेवा काफी हैं. और सेवा कोइ छोटी या बडी नहीं होती सेवा-सेवा होती हैं.
कहते फिर मालिक जी ने बडे प्यार से उसका हाथ पकडा और अपने साथ ले गये.
वह बंदा इतना खुश था मानो सारी दुनियां उसके पैरो के नीचे हैं….
यह साखी लिखने का उद्देश्य इतना ही है कि जब मालिक जी हमे सेवा करने का सुनहरा अवसर दे रहे हैं उसका हमे लाभ लेना चाहिये.
परहित सहित धर्म नहीं माना
प्रकृति सेवा….. मानव सेवा,
जीव सेवा, सेवा भाव ही सच्ची सेवा
“जो जन यह अवसर चूके
तो जनम-जनम पछतायेगा. क्याेकी चाहे ये दुनिया कहे पागल आवारा बस याद रखना चाहिए की
“ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा ”
Radha soami ji

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